छत्तीसगढ़ की धरती पर जन्मे एक संत ने कैसे समाज को समता, सत्य और भाईचारे का मार्ग दिखाया — उनके जीवन के प्रमुख पड़ावों की झलक।
युवावस्था में उन्होंने वन-प्रांतर में एकांतवास करते हुए गहन साधना की, जिसने आगे चलकर उनके उपदेशों की नींव रखी।
बाबा जी ने "सतनाम पंथ" की स्थापना की और छुआछूत व मूर्ति-पूजा जैसी रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई।
गाँव-गाँव में ऊँचे खम्भे — "जैतखाम" — स्थापित किए गए, जिन पर श्वेत ध्वजा फहराई जाती है।
हर वर्ष 18 दिसंबर को "गुरु घासीदास जयंती" मनाई जाती है और पंथी गीत-नृत्य से उनके विचार फैलाए जाते हैं।