परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी (1756 - 1850) भारत के महानतम आध्यात्मिक संतों, समाज सुधारकों और दार्शनिकों में अग्रणी हैं। उन्होंने 18वीं शताब्दी में रूढ़िवादिता और जातिगत उत्पीड़न के अंधकार में "सतनाम" (सत्य का प्रकाश) फैलाकर करोड़ों शोषित, वंचित और पिछड़े लोगों को आत्मसम्मान और समानता का जीवन दिया।
👤 संक्षिप्त जीवन सारणी (Quick Biography Table)
| पूरा नाम | गुरु घासीदास बाबा जी (Guru Ghasidas Baba Ji) |
| जन्म तिथि | 18 दिसम्बर 1756 (सोमवार) |
| जन्म स्थान | गिरौदपुरी, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छत्तीसगढ़) |
| माता-पिता | माता अमरौतिन बाई एवं पिता मंहगू दास जी |
| धर्मपत्नी | माता सफूरा बाई (सिरपुर निवासी) |
| संतान | चार पुत्र (अमरदास, बालकदास, सौरभदास, अघोरीदास) एवं एक पुत्री (सुभद्रा) |
| मूल मंत्र | "मनखे-मनखे एक समान" (सभी मनुष्य एक बराबर हैं) |
| तपोभूमि | अमर गुफा एवं छाता पहाड़, गिरौदपुरी |
🌱 बाल्यकाल और अलौकिक घटनाएं
घासीदास जी बचपन से ही शांत स्वभाव के थे। बाल्यकाल में ही कई अलौकिक घटनाएं घटित हुईं, जिसने ग्रामवासियों को उनके असाधारण व्यक्तित्व का आभास कराया:
- खेत में हल जोतते समय विश्राम: जब बाबा जी ध्यानमग्न हो जाते थे, तो हल और बैल अपने आप खेत की जुताई पूरी कर लेते थे।
- सांप द्वारा छाया: धूप में सोते समय विषैले नाग द्वारा फन फैलाकर उन्हें छाया प्रदान करना।
- सूखे कुएं में जल: बाबा जी के चरण स्पर्श से सूखा कुआं अमृत तुल्य शीतल जल से भर गया, जिसे आज अमृत कुंड कहा जाता है।
📖 प्रमुख उपदेश और दर्शन
- सत्य ही ईश्वर है: मूर्ति पूजा के आडंबरों को छोड़कर निर्गुण, निराकार सतनाम (परमसत्य) की आराधना करें।
- मानव मात्र की समानता: ईश्वर की दृष्टि में कोई जाति, वर्ण या लिंग का भेद नहीं है।
- अहिंसा और जीव दया: किसी भी प्राणी की हत्या न करें, मांसाहार और बलि प्रथा का पूर्ण परित्याग करें।
- श्रम की प्रतिष्ठा: ईमानदारी और पसीने की कमाई खाएं, चोरी और परस्त्री गमन से दूर रहें।