मानवता के महान मसीहा, सामाजिक समता के प्रणेता एवं सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा जी का सम्पूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत जीवन दर्शन।
पौष शुक्ल पक्ष (फाल्गुन मास मेला)
तहसील कसडोल, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छ.ग.)
माता: अमरौतीन दाई
सुपुत्री: सुभद्रा देवी | सुपुत्र: गुरु अमरदास, गुरु बालकदास, गुरु आगरदास, गुरु अड़गडि़हादास
औरा-धौरा वृक्ष की शीतल छांव में आत्मबोध व सतनाम अमृत
सत्य ही ईश्वर है (सतनाम पंथ की स्थापना)
प्रथम पीढ़ी (अमरदास, बालकदास) से लेकर वर्तमान षष्ठम पीढ़ी तक के धर्मगुरुओं का इतिहास।
पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी द्वारा स्थापित सतनाम धर्म के सात पावन बाह्य व आंतरिक प्रतीक जो सत्य, शांति, समता और आत्म-अनुशासन का बोध कराते हैं।
सतनाम समाज गुरु-प्रधान समाज है। गुरु सर्वोच्च मार्गदर्शक, प्रेरक एवं संचालक हैं, जिनका मत सत्य और धर्म का सर्वोच्च आधार है।
21 हाथ का जैतखाम पंचतत्वों का, 3 गुजर प्रेम-दया-करुणा का तथा शीर्ष पर फहराता श्वेत पालो (झंडा) सार्वभौमिक शांति, सत्य व समता का प्रतीक है।
सत्यपुरुष एवं गुरु का पावन श्वेत आसन, जो सादगी, पवित्रता, सत्य-स्मरण और न्यायपूर्ण सामाजिक चेतना का आध्यात्मिक केंद्र है।
7 गांठ एवं 9 ताग का पवित्र श्वेत सूत्र, जो आत्म-संयम, विवेक, शुचिता, धैर्य और सत्य के व्रत-बंधन का पावन प्रतीक है।
गुरु दीक्षा एवं सामाजिक कर्तव्य निर्वहन के समय धारण की जाने वाली कण्ठी माला सत्य की भक्ति, समर्पण और विनम्रता का प्रतीक है।
मस्तक पर लगाया जाने वाला श्वेत चंदन तिलक सात्विक जीवन, शीतल निर्मल बुद्धि, शांति और सतनाम धर्म के प्रति अनन्य आस्था का प्रतीक है।
सत्यपुरुष व गुरु घासीदास बाबा जी के ध्यान से अभिमंत्रित पावन अमृत जल, जो आंतरिक आत्मशुद्धि, आरोग्य और सद्भाव प्रदान करता है।
सत्य, समता, स्वतंत्रता, विश्व-बंधुता और मानवीय मर्यादा पर आधारित सतनाम धर्म की शाश्वत आचार संहिता:
बाबा जी केवल एक संत ही नहीं, अपितु संपूर्ण मानव संस्थान, दार्शनिक, समाजशास्त्री, न्यायविद एवं प्रकृति-वैज्ञानिक थे:
सभी धर्मग्रंथों व विचारों का अध्ययन-मनन कर केवल सत्य व कल्याणकारी तत्वों को स्वीकार करना; जो धारण करने योग्य न हो उसका त्याग करना।
केवल जाग्रत अवस्था में ही नहीं, अपितु स्वप्न व विचारों में भी किसी जीव के प्रति हिंसक न होना। मूक पशु-पक्षियों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना।
बिना गलती के क्षमा मांगना भी कमजोरी है। जो शरणागत होकर अपराध स्वीकार करे उसे सहृदय क्षमा करना; भागते या पराजित पर प्रहार न करना।
अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच, जाति-वर्ण के प्रपंच से मुक्त पूर्ण सामाजिक समता। संसार के समस्त मानव एक समान हैं।
पंचतत्वों से निर्मित काया का उपचार प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, आयुर्वेद व तपोबल से करना। मूक पशुओं (गाय, हाथी, हिरण आदि) को जीवनदान देना।
"हीरे का कोई निश्चित मोल नहीं होता, उसे नीलाम किया जाता है।" फिजूलखर्ची से बचना; धन का सदुपयोग जनकल्याण, समाज व राष्ट्रहित में करना।
बिना परीक्षा व विवेक के किसी भी बात को स्वीकार न करना। पाखंड, स्वर्ग-नरक के भय, अंधविश्वास व बलि प्रथा से मुक्त सत्य धर्म का पालन।
पराधीनता से अच्छा स्वावलंबन है। समाज संगठित होकर शासन-प्रशासन में अपने अधिकारों व मांगों को पूरी मजबूती से रखे।
दूसरों के सुख-दुख व पीड़ा को अपना समझना। आत्मबोध होने पर कोई शत्रु या मित्र नहीं रहता, समस्त सृष्टि में समभाव दिखता है।
साधु, संत, ज्ञानी व विद्वानों की संगति से ज्ञान का बोध होता है। धर्म मनुष्य को जोड़ता है, तोड़ता नहीं।
गिरौदपुरी ग्राम में बाल्यकाल, छाता पहाड़ पर कठिन साधना, सतनाम पंथ की स्थापना, सामाजिक समता व जन-जागरण का संपूर्ण इतिहास।
मध्य भारत के तत्कालीन कौशल प्रांत (वर्तमान बलौदाबाजार-भाटापारा जिला, छत्तीसगढ़) के पावन व प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित ग्राम गिरौदपुरी में 18 दिसम्बर 1756 (पौष शुक्ल पक्ष) को परम पूज्य संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी का प्राकट्य हुआ।
उनके पूज्य पिता पूज्य महंगू दास जी एक सरल, धर्मनिष्ठ एवं सत्यप्रिय व्यक्तित्व थे तथा उनकी ममतामयी माता अमरौतीन दाई अपार वात्सल्य, दया एवं धर्मपरायणता की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं।
बाल्यकाल से ही घासीदास जी असाधारण प्रतिभा, कुशाग्र बुद्धि और गंभीर जिज्ञासु स्वभाव के धनी थे। उन्होंने बचपन से ही तत्कालीन समाज में फैले ऊंच-नीच, छुआछूत, जातिगत भेदभाव, बालश्रम और पशुओं पर होने वाली क्रूरता को अत्यंत निकट से देखा। बाल्यकाल में ही उनके द्वारा किए गए प्रकृति-रक्षण, सर्पदंश चिकित्सा, मूक पशुओं के प्रति असीम करुणा एवं बालश्रम के विरोध ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि यह बालक भविष्य में समूची मानव जाति का उद्धार करने वाला एक महान युगपुरुष और सत्य का संवाहक बनेगा।
युवावस्था में प्रवेश करने पर गुरु घासीदास जी का पावन विवाह सिरपुर क्षेत्र की विदुषी एवं त्यागमयी कन्या सफूरा माता (Mata Saphura Dai) के साथ संपन्न हुआ। सफूरा माता ने सदैव बाबा जी के सत्य, समता और त्याग के मार्ग में एक आदर्श अर्धांगिनी बनकर उनका संबल बढ़ाया।
पूज्य बाबा जी एवं सफूरा माता की पांच संतानें (चार सुपुत्र एवं एक सुपुत्री) हुईं:
18वीं सदी के उत्तरार्ध में तत्कालीन छत्तीसगढ़ में राजनीतिक अस्थिरता, सूबेदारों, पिंडारियों और सामंतों के अत्याचार अपने चरम पर थे। धर्म और वर्ण के नाम पर आम जनता, विशेषकर शोषितों, महिलाओं और श्रमिकों पर अमानवीय अत्याचार किए जाते थे। नर-पशु बलि, अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और पाखंड ने मानवीय गरिमा को कुचल दिया था। इस हृदयविदारक स्थिति ने बाबा जी के अंतर्मन को झकझोर दिया और उन्होंने संपूर्ण मानवता के उद्धार व स्थायी समाधान हेतु गृह-त्याग कर वैराग्य एवं कठोर तपस्या का मार्ग चुनने का दृढ़ संकल्प लिया।
सत्य, समता और मुक्ति के शाश्वत मार्ग की खोज में गुरु घासीदास जी गिरौदपुरी के बीहड़ वनों एवं छाता पहाड़ (Chhata Pahar) की ओर प्रस्थान कर गए। वहां उन्होंने एकांत में स्थित पावन औरा-धौरा वृक्ष के नीचे धुनी रमाई और घोर साधना आरंभ की।
प्रचंड धूप, घनघोर वर्षा, आंधी-तूफान और वन्य हिंसक जीवों के बीच अविचल रहकर बाबा जी ने वर्षों तक कठोर आत्ममंथन व समाधि लगाई। इसी तपोभूमि के समीप स्थित अमर गुफा (Amar Gufa) उनकी गहन ध्यानस्थली बनी।
इस कठिन तपस्या के फलस्वरूप बाबा जी को सत्यपुरुष से साक्षात्कार हुआ और उन्हें ब्रह्मांड के परम सत्य यानी "सतनाम अमृत" की दिव्य अनुभूति हुई। उन्हें यह आत्मबोध हुआ कि प्रकृति के पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) ही सत्यपुरुष का वास्तविक स्वरूप हैं। सत्य ही अनादि, अनंत और अविनाशी है, और सत्य के साक्षात्कार से ही समस्त मानव जाति का कल्याण संभव है।
आत्मज्ञान प्राप्त करने के उपरांत गुरु घासीदास बाबा जी ने संपूर्ण मानव जाति को अंधकार, भय और पाखंड से मुक्त करने हेतु सतनाम पंथ की नींव रखी और ऐतिहासिक उद्घोष किया:
बाबा जी ने स्पष्ट किया कि प्रकृति और सत्यपुरुष ने समस्त जीवों की केवल प्रजातियां (मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष आदि) बनाई हैं; किसी भी मनुष्य की कोई जाति या वर्ण नहीं बनाया। जन्म से सभी मनुष्य पूर्णतः समान, स्वतंत्र और एक ही परम चेतना के अंश हैं।
उन्होंने मूर्तिपूजा, कर्मकांड, बलि प्रथा, छुआछूत, ऊंच-नीच, मद्यपान और मांसाहार का पूर्ण खंडन किया। बाबा जी के सरल, व्यावहारिक और क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर लाखों लोग उनके अनुयायी बने और सत्य के मार्ग पर चलने वाला यह विशाल समूह "सतनामी समाज" के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
गुरु घासीदास बाबा जी ने सतनाम धर्म की आध्यात्मिक पहचान और अनुशासन हेतु सात पावन प्रतीक (Seven Sacred Pillars) स्थापित किए:
बाबा गुरु घासीदास जी ने मानव जीवन को निष्कलंक, सुखी और आदर्श बनाने के लिए सप्त अमर सिद्धांत (Seven Core Principles) प्रदान किए:
गुरु घासीदास बाबा जी केवल आश्रम तक सीमित रहने वाले संत नहीं थे, बल्कि उन्होंने जन-जन तक सत्य का संदेश पहुंचाने के लिए तत्कालीन कौशल प्रांत (छत्तीसगढ़) के 27 प्रमुख क्षेत्रों में ऐतिहासिक 'रावटी यात्राएं' कीं।
इन यात्राओं के दौरान बाबा जी ने अपने 42 अमृत वाणियों (42 Sacred Teachings) के माध्यम से गांव-गांव में चेतना की मशाल जलाई। उन्होंने तत्कालीन सामंती शोषण, जमींदारी क्रूरता और बेगार प्रथा के विरुद्ध अहिंसक सामाजिक क्रांति का शंखनाद किया।
बाबा जी के उपदेशों के प्रभाव से सदियों से चली आ रही नर-पशु बलि प्रथा का समूल उन्मूलन हुआ। शोषित और उपेक्षित वर्ग में स्वाभिमान, आत्म-सम्मान और एकता का ऐसा अभूतपूर्व संचार हुआ कि लाखों परिवारों ने कुरीतियां त्यागकर सत्य और परिश्रम का सात्विक मार्ग अपनाया।
गुरु घासीदास बाबा जी 18वीं सदी के भारत में नारी सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के सबसे बड़े अग्रदूत थे। जब समाज में स्त्रियों को चारदीवारी और सामाजिक बंधनों में जकड़ा गया था, तब बाबा जी ने उद्घोष किया कि नारी और पुरुष दोनों ही सत्यपुरुष के समान अंश हैं।
उन्होंने समाज में निम्नलिखित युगांतकारी सुधार लागू किए:
पूज्य बाबा जी के उपदेशों, सत्य के संदेश और सामाजिक क्रांति को उनके प्रतापी सुपुत्र गुरु बालकदास जी (Guru Balakdas Ji), गुरु अमरदास जी, गुरु आगरदास जी एवं गुरु अड़गडि़हादास जी ने आगे बढ़ाया। गुरु बालकदास जी ने 'रावत नाच' और 'जैतखाम आंदोलन' के माध्यम से समाज को संगठित और निर्भीक बनाया।
कालांतर में गुरु साहेबदास जी, गुरु अगरमनदास जी और चतुर्थ वंशज गुरु गोसाईं अगमदास जी ने इस पावन परंपरा को सींचा। गुरु अगमदास जी ने सन् 1935 में गिरौदपुरी धाम मेले का ऐतिहासिक शुभारंभ किया।
उनके पश्चात भारत की प्रथम महिला सांसद ममतामयी मिनीमाता जी (Minimata Ji) एवं राजराजेश्वरी करुणामाता जी ने संसद से लेकर सड़क तक सतनाम समाज के उत्थान, छुआछूत निवारण विधेयक पारित कराने और गिरौदपुरी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया।
आज गिरौदपुरी धाम में स्थापित 77 मीटर (243 फीट) ऊंचा विशाल श्वेत जैतखाम कुतुबमीनार से भी भव्य और गगनचुंबी है, जो संपूर्ण विश्व को बाबा जी के अमर संदेश "मनखे-मनखे एक समान" की पावन प्रेरणा दे रहा है। प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के मेले में देश-विदेश से 50 लाख से अधिक श्रद्धालु इस पावन तपोभूमि पर शीश नवाने आते हैं।