मंदिर खुला है दर्शन समय: प्रातः 06:00 से रात्रि 10:00 तक
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़
पावन मातृशक्ति परंपरा

सतनाम पंथ के विकास में पूज्य गुरुमाताओं के योगदान की गौरव गाथा

सतनाम पंथ के प्राकट्य से लेकर वर्तमान तक सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक व तीर्थ विकास के प्रत्येक ऐतिहासिक पड़ाव में गुरुमाताओं का अमर व वंदनीय योगदान।

सतनाम आंदोलन में मातृशक्ति का ऐतिहासिक स्थान

सतनाम पंथ के प्रणेता संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी के समय से लेकर वर्तमान काल तक हुए सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक उत्थान के प्रत्येक घटनाक्रम में सत्य के संवाहक गुरु परिवार के साथ-साथ पूज्य गुरुमाताओं का भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी केंद्रीय योगदान रहा है। सतनाम समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान बराबरी का दर्जा प्राप्त है; वे जीवन रूपी रथ के दो समान पहिए हैं।

संसद में ऐतिहासिक कानून (1955)

ममतामयी मिनीमाता जी द्वारा संसद में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 पारित कराकर सदियों के सामाजिक भेदभाव को कानूनी रूप से समाप्त कराया गया।

सामूहिक आदर्श विवाह परंपरा

राजराजेश्वरी करुणामाता जी द्वारा फिजूलखर्ची व दहेज रोकने हेतु गिरौदपुरी धाम में सादगीपूर्ण सामूहिक आदर्श विवाह की ऐतिहासिक नींव रखी गई।

मिनीमाता हसदेव बांगो बांध

किसानों की हजारों एकड़ जमीन की सिंचाई, भिलाई इस्पात संयंत्र में रोजगार और कन्या छात्रावासों की स्थापना में मिनीमाता जी का अविस्मरणीय योगदान।

प्रथम कलश व पालो रोपण (1862)

माघ पूर्णिमा 1862 को गिरौदपुरी धाम के पावन जैतखाम पर सर्वप्रथम श्वेत पालो और मंदिर पर कलश स्थापित करने में गुरुमाताओं की पावन सहभागिता।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी मातृशक्ति

समस्त पूज्य गुरुमाताओं का पावन परिचय एवं अमर योगदान

मूल कुलमाता

राजगुरु कुलमाता सफूरा माता जी

बाबा गुरु घासीदास जी की पावन धर्मपत्नी
संबद्ध तीर्थ स्थल गिरौदपुरी धाम, भण्डारपुरी, तेलासीपुरी

सिरपुर क्षेत्र की विदुषी एवं त्यागमयी कन्या माता सफूरा दाई ने बाबा गुरु घासीदास जी की कठिन साधना के वर्षों में गृहस्थ की संपूर्ण मर्यादा संभाली।

तपस्वी गुरु अमरदास जी की 12 वर्षों की अमर गुफा तपस्या के उपरांत उन्होंने सत्य की परख हेतु गोरसदान मुखपान परीक्षा ली तथा 5 संतानों को सत्य, समता और सतनाम संस्कारों से परिपोषित किया।

प्रथम पीढ़ी (सुपुत्री)

दीदीगुरु सुभद्रा माता जी (सोहद्रा माता)

बाबा गुरु घासीदास जी की प्रथम सुपुत्री
संबद्ध तीर्थ स्थल गिरौदपुरी धाम, भण्डारपुरी धाम

बाबा गुरु घासीदास जी एवं सफूरा माता की सुपुत्री दीदीगुरु सुभद्रा माता वात्सल्य, सेवा और पारिवारिक संस्कारों की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं।

उन्होंने सतनाम आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, गरिमा और आत्मसम्मान को स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया।

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प्रथम पीढ़ी

प्रतापपुरहीन माता जी (माता रुखमणी / अंगारमती)

तपस्वी गुरु अमरदास जी की धर्मपत्नी
संबद्ध तीर्थ स्थल प्रतापपुर, चटुवापुरी धाम, भण्डारपुरी

प्रतापपुर की अवतारी कन्या माता रुखमणी जी का विवाह 1822 ई. में तपस्वी गुरु अमरदास जी के साथ हुआ।

विवाह के उपरांत उन्होंने गुरु अमरदास जी के साथ आजीवन ब्रह्मचर्य धर्म और सत्यपुरुष की भक्ति का पावन व्रत निभाया तथा प्रतापपुर व चटुवापुरी में सतनाम संदेश का प्रसार किया।

प्रथम पीढ़ी

नीरामाता जी एवं राधामाता जी

बलिदानी राजागुरु बालकदास जी की धर्मपत्नियां
संबद्ध तीर्थ स्थल भण्डारपुरी धाम, तेलासी बाड़ा, बोड़सराधाम

राजागुरु बालकदास जी के सामाजिक व राजनीतिक सुधारों, 1857 स्वतंत्रता संग्राम और सतनाम संविधान निर्माण के ऐतिहासिक कार्यों में दोनों माताओं का पूर्ण संबल रहा।

राधामाता की गोद से युवराज गुरु साहेबदास जी का अवतरण हुआ, जिन्होंने बोड़सराधाम गद्दी का कुशल संचालन किया।

प्रथम पीढ़ी

मुटकीमाता जी (रतनपुर)

प्रतापी गुरु आगरदास जी की धर्मपत्नी
संबद्ध तीर्थ स्थल रतनपुर, गिरौदपुरी धाम, भण्डारपुरी धाम

रतनपुर निवासी मुटकीमाता जी का विवाह 1832 ई. में राजागुरु आगरदास जी से हुआ। उनकी गोद से धर्मवीर गुरु अगरमनदास जी का अवतरण हुआ।

माघ पूर्णिमा 1862 को गिरौदपुरी धाम के पावन जैतखाम पर सर्वप्रथम श्वेत पालो और मंदिर पर स्वर्ण कलश स्थापित कराने में मुटकीमाता जी की प्रमुख भूमिका रही।

द्वितीय पीढ़ी

कनुकामाता जी

धर्मवीर गुरु अगरमनदास जी की धर्मपत्नी
संबद्ध तीर्थ स्थल भण्डारपुरी धाम, तेलासीपुरी, खडुवापुरी

सन् 1894 में गुरु अगरमनदास जी के साथ विवाहोपरांत कनुकामाता जी ने समाज सुधार व जनसेवा में जीवन समर्पित किया।

उनकी पावन गोद से महान स्वतंत्रता सेनानी व संविधान सभा सदस्य गुरुगोसाईं अगमदास जी का अवतरण हुआ। अंग्रेजी शासन के कसाईखाना विरोधी जनआंदोलन में उन्होंने संत समाज को अटूट प्रेरणा दी।

तृतीय पीढ़ी (संसदीय गौरव)

ममतामयी मिनीमाता जी (मीनाक्षी देवी)

भारत की प्रथम महिला सांसद (छ.ग.) व समाज सुधारिका
जीवनकाल व दायित्व 1913 – 1972 ई. | लगातार 5 बार लोकसभा सांसद (1952–1972)

असम के पावन परिवार में 13 मार्च 1913 को जन्मीं मिनीमाता जी का विवाह 1932 में गुरुगोसाईं अगमदास जी से हुआ। गुरु अगमदास जी के महाप्रयाण के पश्चात उन्होंने सतनाम समाज और राष्ट्र सेवा का अद्वितीय नेतृत्व किया।

संसदीय कीर्तिमान: वे लगातार 5 बार सांसद रहीं। उन्होंने संसद में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 पारित कराया। मिनीमाता हसदेव बांगो बांध परियोजना, भिलाई इस्पात संयंत्र में स्थानीय रोजगार, महिला शिक्षा और कन्या छात्रावासों की स्थापना में उनका योगदान अमर है।

11 अगस्त 1972 को दिल्ली के समीप विमान दुर्घटना में उनका असामयिक सतलोक गमन हुआ। छत्तीसगढ़ शासन प्रतिवर्ष उत्कृष्ट महिला उत्थान हेतु 'मिनीमाता सम्मान' प्रदान करता है।

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तृतीय पीढ़ी (मेला संरक्षिका)

राजराजेश्वरी करुणामाता जी

गिरौदपुरी धाम मेला संरक्षिका व गुरुमाता
जीवनकाल व दायित्व 1918 – 2006 ई. | गिरौदपुरी मेला व सामाजिक संगठन संरक्षिका

केवटा डबरी के मालगुजार रतिराम जी की सुपुत्री करुणामाता जी का विवाह 1935 में गुरुगोसाईं अगमदास जी से हुआ। उनकी गोद से 19 सितम्बर 1951 को जगतगुरु विजय कुमार जी का अवतरण हुआ।

सामूहिक आदर्श विवाह की जनक: माता जी ने समाज में फिजूलखर्ची व दहेज रोकने हेतु गिरौदपुरी धाम में 'सामूहिक आदर्श विवाह' की ऐतिहासिक शुरुआत की, जहां हजारों निर्धन परिवारों के विवाह सादगी से संपन्न हुए।

1953 से 2006 तक उन्होंने गिरौदपुरी, खडुवापुरी व प्रतापपुर मेले का कुशल संचालन किया और संगठन में राजमहंत, दीवान, भंडारी व छड़ीदारों का मनोनयन कर समाज को सुदृढ़ किया। 31 अगस्त 2006 को वे पंचतत्व में विलीन हुईं।

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वर्तमान पीढ़ी

राजराजेश्वरी कौशलमाता जी, सरितामाता जी एवं दीदीगुरु प्रियंका जी

वर्तमान गुरु परंपरा की संवाहक मातृशक्ति
संबद्ध तीर्थ स्थल गिरौदपुरी धाम, भण्डारपुरी, रायपुर

राजराजेश्वरी कौशलमाता जी (जगतगुरु विजय कुमार जी की धर्मपत्नी) गिरौदपुरी धाम मेला समिति व गद्दी व्यवस्थाओं में संत समाज का वात्सल्यपूर्ण मार्गदर्शन कर रही हैं।

सरितामाता जी (जगतगुरु रूद्र कुमार जी की धर्मपत्नी) एवं दीदीगुरु प्रियंका जी (जगतगुरु विजय कुमार जी की सुपुत्री) आधुनिक युग में बालिका शिक्षा, स्वास्थ्य, युवा संस्कारों और सामाजिक समरसता के कार्यों में सक्रिय सहभागिता निभा रही हैं।

सतनाम पंथ में नारी समानता एवं मातृशक्ति के शाश्वत सिद्धांत

१. जीवन रूपी रथ के दो समान पहिए

सतनाम दर्शन में स्त्री व पुरुष को पूर्णतः समान दर्जा प्राप्त है। पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक निर्णयों में महिलाओं की सहमति अनिवार्य है।

२. कुरीतियों का पूर्ण उन्मूलन

बाबा जी के समय से ही बाल-विवाह, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या का कड़ा विरोध कर नारी गरिमा की रक्षा की गई।

३. विधवा विवाह को पूर्ण सामाजिक मान्यता

18वीं सदी में जब समाज विधवाओं को उपेक्षित करता था, तब सतनाम पंथ ने विधवा माताओं-बहनों को पुनः ससम्मान गृहस्थ जीवन जीने का अधिकार दिया।

४. सादगीपूर्ण वैवाहिक संस्कार (सतनाम रीति)

सामूहिक आदर्श विवाह और बिना किसी आडंबर या फिजूलखर्ची के सत्य और श्वेत पालो की साक्षी में पवित्र विवाह संस्कार।

संपूर्ण गुरु वंशावली देखें

बाबा गुरु घासीदास जी से लेकर वर्तमान षष्ठम पीढ़ी तक के समस्त धर्मगुरुओं की प्रामाणिक वंशावली व इतिहास।

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