परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी ने संसार को बाह्य पाखंडों से मुक्त कर अंतस के वास्तविक सत्य से साक्षात्कार कराया। यह तत्व ज्ञान जीवन के मर्म को उजागर करता है।
हमारा शरीर और यह ब्रह्मांड जिन तत्वों से निर्मित है, उनके गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ और आत्म-जागरण का पथ।
पृथ्वी माता सबको बिना किसी भेदभाव के आश्रय देती है। साधक को भी धरती के समान सहनशील, क्षमाशील और अहंकार रहित होकर सबके साथ समभाव रखना चाहिए।
जल सदैव नीचे की ओर बहकर विनम्रता सिखाता है और सबको तृप्त करता है। मन को जल के समान स्वच्छ, निष्कपट और निर्मल रखना ही सतनाम का आदेश है।
अग्नि अंधकार को मिटाती है और अशुद्धियों को भस्म करती है। आत्म-ज्ञान की पावन अग्नि में काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद रूपी विकारों को भस्म कर देना चाहिए।
वायु प्रत्येक प्राणी को बिना किसी पक्षपात के जीवन देती है। श्वास-श्वास में सतनाम का सुमिरन करना और वायु की भांति स्वतंत्र व निष्काम रहना ही तत्व साधना है।
आकाश समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित रखता है किन्तु किसी से लिप्त नहीं होता। परमात्मा आकाश की भांति सर्वव्यापी, निराकार और निर्लेप है।
पंचतत्वों की काया में वास करने वाली आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। यह परमात्मा का ही अंश है। अपनी आत्मा को पहचानना ही आत्म-साक्षात्कार है।
सृष्टि के आरंभ में भी केवल सत्य था, वर्तमान में भी सत्य है और प्रलय के बाद भी केवल सत्य ही रहेगा। वह निर्गुण, निराकार, अजन्मा और अद्वितीय है। बाह्य मूर्तियों, पाखंडों और अंधविश्वासों से परे, इस परमसत्य की निष्काम भक्ति ही जीवन-मुक्ति का एकमात्र मार्ग है।
सतनाम पंथ के पावन प्रतीक "३१" में समाया है ब्रह्मांडीय सत्य का संपूर्ण तत्व विज्ञान।
अंक '३' सत्व, रज और तम—तीनों सांसारिक गुणों से परे विशुद्ध निर्गुण सत्य को प्रकट करता है। यह त्रिकाल सत्य (भूत, वर्तमान, भविष्य) तथा त्रिविध शुद्धि (मन, वचन और कर्म की सत्यता) का प्रतीक है।
अंक '१' अद्वैत दर्शन को दर्शाता है—सृष्टि में कोई दूसरा नहीं, केवल एक ही परमात्मा है। यह संपूर्ण मानव जाति के एकत्व (मनखे-मनखे एक समान) का अटल आधार है।
'३' और '१' मिलकर यह घोषणा करते हैं कि त्रिभुवन (आकाश, पाताल, भूलोक) में एक ही निरंजन सतनाम सत्यपुरुष का प्रकाश है। जब साधक इस तत्व को समझ लेता है, तो उसका सारा द्वैत और भय मिट जाता है।
बाहरी चिन्ह नहीं, बल्कि अंतःकरण के ऊर्ध्वगमन और चेतना के विकास का विज्ञान।
77 मीटर ऊंचा पावन जैतखाम मनुष्य के मेरूदण्ड (रीढ़) का प्रतीक है। जिस प्रकार जैतखाम धरती से आकाश की ओर उठता है, उसी प्रकार मानव चेतना को मूलाधार (सांसारिक भोग) से सहस्रार (परम चेतना) की ओर उठना चाहिए।
सफेद रंग में संसार के सभी रंग समाहित हैं। यह मन की निर्मलता, सात्विकता और असत्य पर सत्य की विजय का सूचक है। श्वेत पालो लहराना अपनी आत्मा में निष्कलंक सत्य को धारण करने का संकल्प है।
चौका आरती में प्रज्वलित अखंड ज्योति अज्ञान, अंधविश्वास और आडंबर के अंधकार को मिटाने वाली आत्म-ज्योति का साक्षात प्रतीक है।
गले में धारण की जाने वाली पावन कंठी मनुष्य को याद दिलाती है कि उसकी वाणी में सत्य, आहार में सात्विकता और आचरण में जीव दया होनी चाहिए।
दैनिक जीवन में तत्व ज्ञान को उतारने हेतु कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण आत्म-परीक्षण।
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