मंदिर खुला है दर्शन समय: प्रातः 06:00 से रात्रि 10:00 तक
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी का जीवन चरित्र

मानवता के महान मसीहा, सामाजिक समता के प्रणेता एवं सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा जी का सम्पूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत जीवन दर्शन।

पावन जन्म तिथि

18 दिसम्बर 1756

पौष शुक्ल पक्ष (फाल्गुन मास मेला)

जन्मभूमि व मूल ग्राम

गिरौदपुरी धाम

तहसील कसडोल, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छ.ग.)

पूज्य माता-पिता

पिता: पूज्य महंगू दास जी

माता: अमरौतीन दाई

पारिवारिक पृष्ठभूमि

धर्मपत्नी: सफूरा माता जी

सुपुत्री: सुभद्रा देवी | सुपुत्र: गुरु अमरदास, गुरु बालकदास, गुरु आगरदास, गुरु अड़गडि़हादास

पावन तपोस्थली

छाता पहाड़ व अमर गुफा

औरा-धौरा वृक्ष की शीतल छांव में आत्मबोध व सतनाम अमृत

अमर जीवन दर्शन

"मनखे-मनखे एक समान"

सत्य ही ईश्वर है (सतनाम पंथ की स्थापना)

परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी
परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी

“सत्य ही ईश्वर है और सत्य ही मानव का सबसे पावन आभूषण है। समस्त मानव एक समान हैं, जीव हत्या का त्याग करो और परिश्रम की कमाई से सात्विक जीवन जिओ।”

— परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी (1756 – 1850)

परम पूज्य बाबा जी की संपूर्ण पावन गुरु वंशावली

प्रथम पीढ़ी (अमरदास, बालकदास) से लेकर वर्तमान षष्ठम पीढ़ी तक के धर्मगुरुओं का इतिहास।

गुरु वंशावली देखें
पावन आध्यात्मिक धरोहर

सतनाम धर्म के सात पावन प्रतीक एवं स्तंभ

पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी द्वारा स्थापित सतनाम धर्म के सात पावन बाह्य व आंतरिक प्रतीक जो सत्य, शांति, समता और आत्म-अनुशासन का बोध कराते हैं।

1. गुरु (The Guru)

सतनाम समाज गुरु-प्रधान समाज है। गुरु सर्वोच्च मार्गदर्शक, प्रेरक एवं संचालक हैं, जिनका मत सत्य और धर्म का सर्वोच्च आधार है।

2. जैतखाम व श्वेत ध्वज

21 हाथ का जैतखाम पंचतत्वों का, 3 गुजर प्रेम-दया-करुणा का तथा शीर्ष पर फहराता श्वेत पालो (झंडा) सार्वभौमिक शांति, सत्य व समता का प्रतीक है।

3. गुरु गद्दी (Gaddi)

सत्यपुरुष एवं गुरु का पावन श्वेत आसन, जो सादगी, पवित्रता, सत्य-स्मरण और न्यायपूर्ण सामाजिक चेतना का आध्यात्मिक केंद्र है।

4. सतनाम सूत्र (जनेऊ)

7 गांठ एवं 9 ताग का पवित्र श्वेत सूत्र, जो आत्म-संयम, विवेक, शुचिता, धैर्य और सत्य के व्रत-बंधन का पावन प्रतीक है।

5. कण्ठी माला

गुरु दीक्षा एवं सामाजिक कर्तव्य निर्वहन के समय धारण की जाने वाली कण्ठी माला सत्य की भक्ति, समर्पण और विनम्रता का प्रतीक है।

6. श्वेत चंदन तिलक

मस्तक पर लगाया जाने वाला श्वेत चंदन तिलक सात्विक जीवन, शीतल निर्मल बुद्धि, शांति और सतनाम धर्म के प्रति अनन्य आस्था का प्रतीक है।

7. अमृत जल (Amrit)

सत्यपुरुष व गुरु घासीदास बाबा जी के ध्यान से अभिमंत्रित पावन अमृत जल, जो आंतरिक आत्मशुद्धि, आरोग्य और सद्भाव प्रदान करता है।

सतनाम आचार संहिता

सतनाम धर्म की २० मूल मान्यताएं एवं जीवन दर्शन

सत्य, समता, स्वतंत्रता, विश्व-बंधुता और मानवीय मर्यादा पर आधारित सतनाम धर्म की शाश्वत आचार संहिता:

१.
संस्थापक व पूज्य: गुरु घासीदास जी सतनाम धर्म के संस्थापक व संतशिरोमणि हैं।
२.
सत्य ही सर्वोपरि: संसार में सत्य से बड़ा कोई अन्य धर्म या ईश्वर नहीं है।
३.
पावन प्रतीक: पवित्र जैतखाम, श्वेत ध्वज एवं गुरुद्वारा सतनाम के मुख्य प्रतीक हैं।
४.
सर्वव्यापी सत्यपुरुष: सृष्टि का कर्ता एक निराकार सत्यपुरुष है जो सर्वत्र व्याप्त है।
५.
न्याय व्यवस्था: सतनाम धर्म में समाज एवं गुरु को न्यायकर्ता माना जाता है।
६.
सात्विक पूजन: सतनाम धर्म में सादगीपूर्ण नारियल (भेंट) व श्वेत पूजा का पावन रिवाज है।
७.
जाति-पाति का निषेध: सभी मानव एक समान हैं; वर्ण व्यवस्था व छुआछूत का पूर्ण निषेध है।
८.
माता-पिता व गुरु सम्मान: गुरु, संत, साधु एवं माता-पिता का सर्वोच्च आदर करना।
९.
मानव अधिकार: प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता, समानता व राष्ट्रीयता का अधिकार है।
१०.
त्याग व तपस्या: समाज के लिए त्याग, तपस्या व परोपकार करने वालों का सम्मान।
११.
अहिंसा व जीव दया: समस्त मूक पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, करुणा व अहिंसा की भावना।
१२.
पाखंड का खंडन: अंधविश्वास, जादू-टोना, तंत्र-मंत्र व बलि प्रथा का पूर्ण खंडन।
१३.
रंगभेद से मुक्ति: रंगभेद, छुआछूत व किसी भी प्रकार के सामाजिक भेदभाव का त्याग।
१४.
अहिंसक समाज: हिंसा का पूर्ण विरोध एवं बाबा जी के सप्त उपदेशों पर निष्ठा।
१५.
सत्य वचनों का आदर: सभी धर्मों व संतों के सत्य वचनों व उच्च मानवीय मूल्यों का सम्मान।
१६.
विश्व बंधुता: सत्य, प्रेम, न्याय, करुणा, मैत्री एवं सार्वभौमिक बंधुत्व में विश्वास।
१७.
सर्वांगीण विकास: आत्म-साक्षात्कार, परिश्रम और सात्विक जीवन से मानव का कल्याण।
१८.
संविधान व कानून: भाग्यवाद के स्थान पर कर्मयोग, राष्ट्र के संविधान व विधि का सम्मान।
१९.
नारी सशक्तिकरण: महिलाओं को पुरुषों के समान समस्त सामाजिक, धार्मिक व वैचारिक अधिकार।
२०.
सार्वभौमिक स्वीकार्यता: सत्यपुरुष ने कोई जाति नहीं बनाई; कोई भी व्यक्ति सतनाम अपना सकता है।
बहुआयामी दिव्य दर्शन

बाबा गुरु घासीदास जी के १० बहुआयामी दिव्य दृष्टिकोण

बाबा जी केवल एक संत ही नहीं, अपितु संपूर्ण मानव संस्थान, दार्शनिक, समाजशास्त्री, न्यायविद एवं प्रकृति-वैज्ञानिक थे:

१. दार्शनिक दृष्टिकोण

सभी धर्मग्रंथों व विचारों का अध्ययन-मनन कर केवल सत्य व कल्याणकारी तत्वों को स्वीकार करना; जो धारण करने योग्य न हो उसका त्याग करना।

२. अहिंसा का सर्वोच्च प्रतिमान

केवल जाग्रत अवस्था में ही नहीं, अपितु स्वप्न व विचारों में भी किसी जीव के प्रति हिंसक न होना। मूक पशु-पक्षियों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना।

३. न्यायिक व क्षमा दृष्टिकोण

बिना गलती के क्षमा मांगना भी कमजोरी है। जो शरणागत होकर अपराध स्वीकार करे उसे सहृदय क्षमा करना; भागते या पराजित पर प्रहार न करना।

४. समाजशास्त्रीय समता

अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच, जाति-वर्ण के प्रपंच से मुक्त पूर्ण सामाजिक समता। संसार के समस्त मानव एक समान हैं।

५. चिकित्सा व प्रकृति-विज्ञान

पंचतत्वों से निर्मित काया का उपचार प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, आयुर्वेद व तपोबल से करना। मूक पशुओं (गाय, हाथी, हिरण आदि) को जीवनदान देना।

६. अर्थशास्त्रीय विवेक

"हीरे का कोई निश्चित मोल नहीं होता, उसे नीलाम किया जाता है।" फिजूलखर्ची से बचना; धन का सदुपयोग जनकल्याण, समाज व राष्ट्रहित में करना।

७. धर्मशास्त्रीय शुद्धि

बिना परीक्षा व विवेक के किसी भी बात को स्वीकार न करना। पाखंड, स्वर्ग-नरक के भय, अंधविश्वास व बलि प्रथा से मुक्त सत्य धर्म का पालन।

८. राजनीतिक चेतना व स्वावलंबन

पराधीनता से अच्छा स्वावलंबन है। समाज संगठित होकर शासन-प्रशासन में अपने अधिकारों व मांगों को पूरी मजबूती से रखे।

९. आत्मदर्शन व साक्षात्कार

दूसरों के सुख-दुख व पीड़ा को अपना समझना। आत्मबोध होने पर कोई शत्रु या मित्र नहीं रहता, समस्त सृष्टि में समभाव दिखता है।

१०. सर्वसमावेशी सत्संग

साधु, संत, ज्ञानी व विद्वानों की संगति से ज्ञान का बोध होता है। धर्म मनुष्य को जोड़ता है, तोड़ता नहीं।

प्रामाणिक जीवन गाथा

जीवन चरित्र: ९ दिव्य प्रसंग एवं ऐतिहासिक पड़ाव

गिरौदपुरी ग्राम में बाल्यकाल, छाता पहाड़ पर कठिन साधना, सतनाम पंथ की स्थापना, सामाजिक समता व जन-जागरण का संपूर्ण इतिहास।

18 दिसम्बर 1756

पावन अवतरण एवं बाल्यकाल — गिरौदपुरी की पावन धरा पर प्राकट्य

मध्य भारत के तत्कालीन कौशल प्रांत (वर्तमान बलौदाबाजार-भाटापारा जिला, छत्तीसगढ़) के पावन व प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित ग्राम गिरौदपुरी में 18 दिसम्बर 1756 (पौष शुक्ल पक्ष) को परम पूज्य संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी का प्राकट्य हुआ।

उनके पूज्य पिता पूज्य महंगू दास जी एक सरल, धर्मनिष्ठ एवं सत्यप्रिय व्यक्तित्व थे तथा उनकी ममतामयी माता अमरौतीन दाई अपार वात्सल्य, दया एवं धर्मपरायणता की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं।

बाल्यकाल से ही घासीदास जी असाधारण प्रतिभा, कुशाग्र बुद्धि और गंभीर जिज्ञासु स्वभाव के धनी थे। उन्होंने बचपन से ही तत्कालीन समाज में फैले ऊंच-नीच, छुआछूत, जातिगत भेदभाव, बालश्रम और पशुओं पर होने वाली क्रूरता को अत्यंत निकट से देखा। बाल्यकाल में ही उनके द्वारा किए गए प्रकृति-रक्षण, सर्पदंश चिकित्सा, मूक पशुओं के प्रति असीम करुणा एवं बालश्रम के विरोध ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि यह बालक भविष्य में समूची मानव जाति का उद्धार करने वाला एक महान युगपुरुष और सत्य का संवाहक बनेगा।

पावन अवतरण एवं बाल्यकाल — गिरौदपुरी की पावन धरा पर प्राकट्य
पावन अवतरण एवं बाल्यकाल — गिरौदपुरी की पावन धरा पर प्राकट्य
गृहस्थ जीवन एवं परिवार

गृहस्थ जीवन, सफूरा माता, पांच संतानें एवं तत्कालीन समाज की विभीषिका

युवावस्था में प्रवेश करने पर गुरु घासीदास जी का पावन विवाह सिरपुर क्षेत्र की विदुषी एवं त्यागमयी कन्या सफूरा माता (Mata Saphura Dai) के साथ संपन्न हुआ। सफूरा माता ने सदैव बाबा जी के सत्य, समता और त्याग के मार्ग में एक आदर्श अर्धांगिनी बनकर उनका संबल बढ़ाया।

पूज्य बाबा जी एवं सफूरा माता की पांच संतानें (चार सुपुत्र एवं एक सुपुत्री) हुईं:

  • सुभद्रा देवी (प्रथम सुपुत्री — वात्सल्य एवं सेवा की प्रतिमूर्ति)
  • गुरु अमरदास जी (ज्येष्ठ सुपुत्र — सत्य व धर्म के प्रचारक)
  • गुरु बालकदास जी (द्वितीय सुपुत्र — महान समाज सुधारक, वीर योद्धा एवं सतनाम आंदोलन के प्रणेता)
  • गुरु आगरदास जी (तृतीय सुपुत्र — आध्यात्मिक चिंतक व प्रचारक)
  • गुरु अड़गडि़हादास जी (चतुर्थ सुपुत्र — सादगी व सतनाम के निष्ठावान संवाहक)

18वीं सदी के उत्तरार्ध में तत्कालीन छत्तीसगढ़ में राजनीतिक अस्थिरता, सूबेदारों, पिंडारियों और सामंतों के अत्याचार अपने चरम पर थे। धर्म और वर्ण के नाम पर आम जनता, विशेषकर शोषितों, महिलाओं और श्रमिकों पर अमानवीय अत्याचार किए जाते थे। नर-पशु बलि, अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और पाखंड ने मानवीय गरिमा को कुचल दिया था। इस हृदयविदारक स्थिति ने बाबा जी के अंतर्मन को झकझोर दिया और उन्होंने संपूर्ण मानवता के उद्धार व स्थायी समाधान हेतु गृह-त्याग कर वैराग्य एवं कठोर तपस्या का मार्ग चुनने का दृढ़ संकल्प लिया।

गृहस्थ जीवन, सफूरा माता, पांच संतानें एवं तत्कालीन समाज की विभीषिका
कठिन साधना एवं आत्मबोध

छाता पहाड़, औरा-धौरा वृक्ष व अमर गुफा में तपस्या एवं 'सतनाम अमृत' की प्राप्ति

सत्य, समता और मुक्ति के शाश्वत मार्ग की खोज में गुरु घासीदास जी गिरौदपुरी के बीहड़ वनों एवं छाता पहाड़ (Chhata Pahar) की ओर प्रस्थान कर गए। वहां उन्होंने एकांत में स्थित पावन औरा-धौरा वृक्ष के नीचे धुनी रमाई और घोर साधना आरंभ की।

प्रचंड धूप, घनघोर वर्षा, आंधी-तूफान और वन्य हिंसक जीवों के बीच अविचल रहकर बाबा जी ने वर्षों तक कठोर आत्ममंथन व समाधि लगाई। इसी तपोभूमि के समीप स्थित अमर गुफा (Amar Gufa) उनकी गहन ध्यानस्थली बनी।

इस कठिन तपस्या के फलस्वरूप बाबा जी को सत्यपुरुष से साक्षात्कार हुआ और उन्हें ब्रह्मांड के परम सत्य यानी "सतनाम अमृत" की दिव्य अनुभूति हुई। उन्हें यह आत्मबोध हुआ कि प्रकृति के पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) ही सत्यपुरुष का वास्तविक स्वरूप हैं। सत्य ही अनादि, अनंत और अविनाशी है, और सत्य के साक्षात्कार से ही समस्त मानव जाति का कल्याण संभव है।

सतनाम पंथ की स्थापना

सतनाम पंथ का पुनर्जागरण एवं 'मनखे-मनखे एक समान' का ऐतिहासिक उद्घोष

आत्मज्ञान प्राप्त करने के उपरांत गुरु घासीदास बाबा जी ने संपूर्ण मानव जाति को अंधकार, भय और पाखंड से मुक्त करने हेतु सतनाम पंथ की नींव रखी और ऐतिहासिक उद्घोष किया:

"मनखे-मनखे एक समान — सत्य ही ईश्वर है और सत्य ही मानव का सबसे पावन आभूषण है।"

बाबा जी ने स्पष्ट किया कि प्रकृति और सत्यपुरुष ने समस्त जीवों की केवल प्रजातियां (मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष आदि) बनाई हैं; किसी भी मनुष्य की कोई जाति या वर्ण नहीं बनाया। जन्म से सभी मनुष्य पूर्णतः समान, स्वतंत्र और एक ही परम चेतना के अंश हैं।

उन्होंने मूर्तिपूजा, कर्मकांड, बलि प्रथा, छुआछूत, ऊंच-नीच, मद्यपान और मांसाहार का पूर्ण खंडन किया। बाबा जी के सरल, व्यावहारिक और क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर लाखों लोग उनके अनुयायी बने और सत्य के मार्ग पर चलने वाला यह विशाल समूह "सतनामी समाज" के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

सतनाम के पावन प्रतीक

सतनाम धर्म के सात पावन प्रतीक — सत्य, शांति व समता की अमर पहचान

गुरु घासीदास बाबा जी ने सतनाम धर्म की आध्यात्मिक पहचान और अनुशासन हेतु सात पावन प्रतीक (Seven Sacred Pillars) स्थापित किए:

  1. गुरु (The Spiritual Master): समाज के सर्वोच्च मार्गदर्शक, प्रेरक एवं नियंत्रक, जिनका आदेश सत्य और धर्म का आधार है।
  2. जैतखाम एवं श्वेत ध्वज (Jaitkham & White Flag): 21 हाथ का विजय स्तंभ पंचतत्वों (भूमि, जल, अग्नि, वायु, नभ) का प्रतीक है। 5 हाथ का डंडा पंचशील का, 3 गुजर प्रेम-दया-करुणा के तथा शीर्ष पर फहराता धवल श्वेत पालो (White Flag) सत्य, शांति एवं सार्वभौमिक समता का सर्वोच्च प्रतीक है।
  3. गुरु गद्दी (The Sacred Seat): सादगी, पवित्रता और सत्यपुरुष का पावन आसन, जो सत्य के निरंतर स्मरण का केंद्र है।
  4. सतनाम सूत्र / जनेऊ (Sacred Thread): 7 गांठ और 9 ताग का श्वेत सूत्र, जो आत्म-संयम, विवेक, धैर्य और सत्य के व्रत-बंधन का प्रतीक है।
  5. कण्ठी माला (Devotional Rosary): सत्य की अनन्य भक्ति, विनम्रता और समर्पण का प्रतीक।
  6. श्वेत चंदन तिलक (White Sandalwood Tilak): मस्तक पर धारण किया जाने वाला सात्विकता, निर्मल बुद्धि, शांति और आत्म-गरिमा का प्रतीक।
  7. अमृत जल (Amrit Jal): सत्यपुरुष के नाम से अभिमंत्रित पावन जल, जो आत्मशुद्धि, आरोग्य और सद्भाव का प्रतीक है।
सप्त सिद्धांत एवं मूल मान्यताएं

सतनाम के सात अमर सिद्धांत एवं सामाजिक आचरण की मूल संहिता

बाबा गुरु घासीदास जी ने मानव जीवन को निष्कलंक, सुखी और आदर्श बनाने के लिए सप्त अमर सिद्धांत (Seven Core Principles) प्रदान किए:

  • 1. सतनाम पर अटूट विश्वास: केवल एक सर्वव्यापी सत्यपुरुष (सतनाम) की आराधना करना।
  • 2. मूर्तिपूजा एवं पाखंड का त्याग: पत्थर की निर्जीव मूर्तियों, अंधविश्वास और आडंबरों से मुक्ति।
  • 3. जाति-पाति व छुआछूत का निषेध: संपूर्ण मानव जाति को एक समान समझना और किसी से भेदभाव न करना।
  • 4. पूर्ण शाकाहार एवं जीव दया: मांसाहार का पूर्ण त्याग और समस्त मूक प्राणियों के प्रति करुणा का भाव।
  • 5. मद्यपान व नशा मुक्ति: शराब, गांजा, अफीम सहित समस्त नशीले पदार्थों का पूर्ण बहिष्कार।
  • 6. पर-स्त्री एवं पर-धन का त्याग: नैतिक शुचिता, सत्यनिष्ठ आचरण और पराई संपत्ति/भूमि पर लोभ न करना।
  • 7. दोपहर में हल जोतने का निषेध: मूक पशुओं (बैलों व गौवंश) को धूप और क्रूरता से बचाने के लिए दोपहर 12 से 3 बजे तक हल जोतना वर्जित करना — यह पर्यावरण व पशु-अधिकार का विश्व का पहला ऐतिहासिक कानून था।
27 रावटी यात्राएं एवं सामाजिक क्रांति

कौशल प्रांत में 27 रावटी यात्राएं, 42 अमृत वाणियां एवं बलि प्रथा का समूल उन्मूलन

गुरु घासीदास बाबा जी केवल आश्रम तक सीमित रहने वाले संत नहीं थे, बल्कि उन्होंने जन-जन तक सत्य का संदेश पहुंचाने के लिए तत्कालीन कौशल प्रांत (छत्तीसगढ़) के 27 प्रमुख क्षेत्रों में ऐतिहासिक 'रावटी यात्राएं' कीं।

इन यात्राओं के दौरान बाबा जी ने अपने 42 अमृत वाणियों (42 Sacred Teachings) के माध्यम से गांव-गांव में चेतना की मशाल जलाई। उन्होंने तत्कालीन सामंती शोषण, जमींदारी क्रूरता और बेगार प्रथा के विरुद्ध अहिंसक सामाजिक क्रांति का शंखनाद किया।

बाबा जी के उपदेशों के प्रभाव से सदियों से चली आ रही नर-पशु बलि प्रथा का समूल उन्मूलन हुआ। शोषित और उपेक्षित वर्ग में स्वाभिमान, आत्म-सम्मान और एकता का ऐसा अभूतपूर्व संचार हुआ कि लाखों परिवारों ने कुरीतियां त्यागकर सत्य और परिश्रम का सात्विक मार्ग अपनाया।

नारी सशक्तिकरण एवं समानता

नारी सम्मान, बाल-विवाह का विरोध एवं मानवीय गरिमा की पुनःस्थापना

गुरु घासीदास बाबा जी 18वीं सदी के भारत में नारी सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के सबसे बड़े अग्रदूत थे। जब समाज में स्त्रियों को चारदीवारी और सामाजिक बंधनों में जकड़ा गया था, तब बाबा जी ने उद्घोष किया कि नारी और पुरुष दोनों ही सत्यपुरुष के समान अंश हैं।

उन्होंने समाज में निम्नलिखित युगांतकारी सुधार लागू किए:

  • समान सामाजिक व धार्मिक अधिकार: सतनाम धर्म में महिलाओं को पुरुषों के समान सभी पूजा, अनुष्ठान और सामाजिक सभाओं में नेतृत्व का पूर्ण अधिकार दिया गया।
  • बाल-विवाह व पर्दा प्रथा का विरोध: बाबा जी ने बाल-विवाह और पर्दा प्रथा का कड़ा विरोध करते हुए कन्याओं की गरिमा और सुरक्षा पर बल दिया।
  • विधवा विवाह को मान्यता: तत्कालीन समाज में उपेक्षित विधवा माताओं-बहनों को पुनः सम्मानपूर्वक पारिवारिक जीवन जीने (पुनर्विवाह) का सामाजिक अधिकार प्रदान किया।
  • दहेज प्रथा व फिजूलखर्ची पर रोक: सादगीपूर्ण वैवाहिक संस्कार (सतनाम रीति) को स्थापित किया, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ न पड़े।
अमर विरासत एवं गिरौदपुरी महातीर्थ

अमर विरासत, गुरु परंपरा, ममतामयी मिनीमाता जी एवं गिरौदपुरी धाम का वैश्विक स्वरूप

पूज्य बाबा जी के उपदेशों, सत्य के संदेश और सामाजिक क्रांति को उनके प्रतापी सुपुत्र गुरु बालकदास जी (Guru Balakdas Ji), गुरु अमरदास जी, गुरु आगरदास जी एवं गुरु अड़गडि़हादास जी ने आगे बढ़ाया। गुरु बालकदास जी ने 'रावत नाच' और 'जैतखाम आंदोलन' के माध्यम से समाज को संगठित और निर्भीक बनाया।

कालांतर में गुरु साहेबदास जी, गुरु अगरमनदास जी और चतुर्थ वंशज गुरु गोसाईं अगमदास जी ने इस पावन परंपरा को सींचा। गुरु अगमदास जी ने सन् 1935 में गिरौदपुरी धाम मेले का ऐतिहासिक शुभारंभ किया।

उनके पश्चात भारत की प्रथम महिला सांसद ममतामयी मिनीमाता जी (Minimata Ji) एवं राजराजेश्वरी करुणामाता जी ने संसद से लेकर सड़क तक सतनाम समाज के उत्थान, छुआछूत निवारण विधेयक पारित कराने और गिरौदपुरी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया।

आज गिरौदपुरी धाम में स्थापित 77 मीटर (243 फीट) ऊंचा विशाल श्वेत जैतखाम कुतुबमीनार से भी भव्य और गगनचुंबी है, जो संपूर्ण विश्व को बाबा जी के अमर संदेश "मनखे-मनखे एक समान" की पावन प्रेरणा दे रहा है। प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के मेले में देश-विदेश से 50 लाख से अधिक श्रद्धालु इस पावन तपोभूमि पर शीश नवाने आते हैं।