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Balodabazar, CG
पावन सतनाम ३१ प्रतीक चिन्ह
॥ सत्य ही मानव का आभूषण है ॥

सतनाम तत्व ज्ञान एवं दिव्य बोध — परम ज्ञान

परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी ने संसार को बाह्य पाखंडों से मुक्त कर अंतस के वास्तविक सत्य से साक्षात्कार कराया। यह तत्व ज्ञान जीवन के मर्म को उजागर करता है।

दैनिक तत्व सूत्र

अमृत वाणी एवं पावन तत्व सूत्र

परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी के अमृत वचनों का चिंतन करें, स्वाध्याय करें एवं शेयर करें।

सृष्टि एवं काया का मर्म

पंच महाभूत, आत्म तत्व एवं परम तत्व

हमारा शरीर और यह ब्रह्मांड जिन तत्वों से निर्मित है, उनके गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ और आत्म-जागरण का पथ।

क्षिति (पृथ्वी तत्व)

धैर्य, क्षमा एवं समता

पृथ्वी माता सबको बिना किसी भेदभाव के आश्रय देती है। साधक को भी धरती के समान सहनशील, क्षमाशील और अहंकार रहित होकर सबके साथ समभाव रखना चाहिए।

॥ मिट्टी से उपजा, मिट्टी में समाना — अहंकार का पूर्ण विसर्जन ॥

अप (जल तत्व)

निर्मलता, प्रेम एवं सरलता

जल सदैव नीचे की ओर बहकर विनम्रता सिखाता है और सबको तृप्त करता है। मन को जल के समान स्वच्छ, निष्कपट और निर्मल रखना ही सतनाम का आदेश है।

॥ जल कस निर्मल अंतस राख — मन में मैल न ठहरने पाए ॥

पावक (अग्नि तत्व)

ज्ञान, तेज एवं असत्य का दहन

अग्नि अंधकार को मिटाती है और अशुद्धियों को भस्म करती है। आत्म-ज्ञान की पावन अग्नि में काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद रूपी विकारों को भस्म कर देना चाहिए।

॥ ज्ञान के तेज ले अज्ञान का अंधियार मिटाओ ॥

समीर (वायु तत्व)

प्राण, निरंतरता एवं समदृष्टि

वायु प्रत्येक प्राणी को बिना किसी पक्षपात के जीवन देती है। श्वास-श्वास में सतनाम का सुमिरन करना और वायु की भांति स्वतंत्र व निष्काम रहना ही तत्व साधना है।

॥ श्वास-श्वास में नाम जपो, वृथा श्वास मत खोय ॥

गगन (आकाश तत्व)

निराकार, असीम एवं सर्वव्यापक

आकाश समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित रखता है किन्तु किसी से लिप्त नहीं होता। परमात्मा आकाश की भांति सर्वव्यापी, निराकार और निर्लेप है।

॥ आकाश समान निर्लेप हो, परमात्मा में लय हो जाना ॥

आत्म तत्व (चेतना)

घट-घट वासी ज्योति, अविनाशी

पंचतत्वों की काया में वास करने वाली आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। यह परमात्मा का ही अंश है। अपनी आत्मा को पहचानना ही आत्म-साक्षात्कार है।

॥ घट भीतर जो ज्योति जगमगावे, वही सतनाम का अंश कहावे ॥

परम तत्व (एको सतनाम — निर्गुण निराकार)

सर्वोच्च सत्ता • सत्य ही ईश्वर है

सृष्टि के आरंभ में भी केवल सत्य था, वर्तमान में भी सत्य है और प्रलय के बाद भी केवल सत्य ही रहेगा। वह निर्गुण, निराकार, अजन्मा और अद्वितीय है। बाह्य मूर्तियों, पाखंडों और अंधविश्वासों से परे, इस परमसत्य की निष्काम भक्ति ही जीवन-मुक्ति का एकमात्र मार्ग है।

॥ एको सतनाम निर्भय निर्वैर • मनखे-मनखे एक समान ॥
अलौकिक प्रतीक रहस्य

पावन "३१" का दिव्य तत्व बोध

सतनाम पंथ के पावन प्रतीक "३१" में समाया है ब्रह्मांडीय सत्य का संपूर्ण तत्व विज्ञान।

पावन सतनाम ३१ प्रतीक चिन्ह
॥ सत्य ही मानव का आभूषण है ॥
३

त्रिगुणातीत एवं त्रिविध सत्य

अंक '३' सत्व, रज और तम—तीनों सांसारिक गुणों से परे विशुद्ध निर्गुण सत्य को प्रकट करता है। यह त्रिकाल सत्य (भूत, वर्तमान, भविष्य) तथा त्रिविध शुद्धि (मन, वचन और कर्म की सत्यता) का प्रतीक है।

१

अद्वैत चेतना (एको सतनाम)

अंक '१' अद्वैत दर्शन को दर्शाता है—सृष्टि में कोई दूसरा नहीं, केवल एक ही परमात्मा है। यह संपूर्ण मानव जाति के एकत्व (मनखे-मनखे एक समान) का अटल आधार है।

३१ का महा-संयोग

तीनों लोकों में एक ही सत्यपुरुष का अखंड राज

'३' और '१' मिलकर यह घोषणा करते हैं कि त्रिभुवन (आकाश, पाताल, भूलोक) में एक ही निरंजन सतनाम सत्यपुरुष का प्रकाश है। जब साधक इस तत्व को समझ लेता है, तो उसका सारा द्वैत और भय मिट जाता है।

आध्यात्मिक प्रतीक

जैतखाम एवं श्वेत पालो का तत्वार्थ

बाहरी चिन्ह नहीं, बल्कि अंतःकरण के ऊर्ध्वगमन और चेतना के विकास का विज्ञान।

जैतखाम — मेरूदण्ड एवं आत्म-उत्थान

77 मीटर ऊंचा पावन जैतखाम मनुष्य के मेरूदण्ड (रीढ़) का प्रतीक है। जिस प्रकार जैतखाम धरती से आकाश की ओर उठता है, उसी प्रकार मानव चेतना को मूलाधार (सांसारिक भोग) से सहस्रार (परम चेतना) की ओर उठना चाहिए।

श्वेत पालो — निष्कलंक सत्य ध्वज

सफेद रंग में संसार के सभी रंग समाहित हैं। यह मन की निर्मलता, सात्विकता और असत्य पर सत्य की विजय का सूचक है। श्वेत पालो लहराना अपनी आत्मा में निष्कलंक सत्य को धारण करने का संकल्प है।

अखंड ज्योति — ज्ञान का प्रकाश

चौका आरती में प्रज्वलित अखंड ज्योति अज्ञान, अंधविश्वास और आडंबर के अंधकार को मिटाने वाली आत्म-ज्योति का साक्षात प्रतीक है।

काष्ठ कंठी — मर्यादा एवं संयम

गले में धारण की जाने वाली पावन कंठी मनुष्य को याद दिलाती है कि उसकी वाणी में सत्य, आहार में सात्विकता और आचरण में जीव दया होनी चाहिए।

अंतर्मुखी चिंतन

आत्म-चिंतन एवं तत्व प्रश्नोत्तरी

दैनिक जीवन में तत्व ज्ञान को उतारने हेतु कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण आत्म-परीक्षण।

गुरु घासीदास बाबा जी का तत्व उपदेश है—"मनखे-मनखे एक समान"। यदि हम किसी से उसकी जाति, वर्ग या स्थिति के कारण घृणा या भेदभाव करते हैं, तो हम तत्व ज्ञान से दूर हैं। जब हम सबमें उस एक ज्योति का दर्शन करेंगे, तभी वास्तविक भक्ति फलित होगी।
जब यह ज्ञात हो जाता है कि शरीर माटी का खिलौना है और एक दिन नष्ट हो जाएगा, तो साधक का अभिमान, ईर्ष्या और लोभ स्वतः समाप्त हो जाते हैं। वह सत्य कर्म और निष्काम परोपकार में अपना जीवन समर्पित करता है।
जो परमात्मा कण-कण और रोम-रोम में जीवन बनकर धड़क रहा है, उसे किसी सीमित पत्थर या धातु की प्रतिमा में बांधना अज्ञान है। बाबा जी ने सिखाया कि अपने अंतःकरण को स्वच्छ कर घट-घट वासी सत्य का साक्षात्कार करो।
प्रातः उठकर सतनाम का सुमिरन करें, दिनभर सत्य की कमाई खाएं, मूक जीवों पर दया रखें, दोपहर में बैलों को विश्राम दें, नशे-व्यसनों से दूर रहें, और सायंकाल परिवार सहित पावन ज्योति प्रज्वलित कर सत्य वचनों का चिंतन करें।

सत्य तत्व संकल्प

"मैं संकल्प लेता हूँ कि सत्य के मार्ग पर चलूँगा, सभी मनुष्यों को एक समान समझूँगा, मूक जीवों पर दया करूँगा, और अपने अंतस में सतनाम की पावन ज्योति को सदैव प्रज्वलित रखूँगा।"

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