संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
पावन जीवन गाथा एवं ऐतिहासिक योगदान
1756 से 1850 ई. तक सम्पूर्ण भारत में सतनाम चेतना का संचार, 7 पावन स्तंभों व सप्त सिद्धांतों की स्थापना, 27 पावन रवतियां व 42 अनमोल अमृत वाणियां।
अवतरण एवं पावन बाल्यकाल
मध्य भारत के तत्कालीन कौशल प्रांत के प्राकृतिक गिरौदपुरी ग्राम में 18 दिसम्बर 1756 को सत्य के महासूर्य बाबा गुरु घासीदास जी का अवतरण हुआ। बाल्यकाल से ही वे गहन विचारशील, दयालु एवं प्राणियों के प्रति करुणा से परिपूर्ण थे।
छाता पहाड़ एवं अमर गुफा में घोर तपस्या
संसार के दुखों, सामाजिक असमानता और छुआछूत से व्यथित होकर बाबा जी ने गिरौदपुरी के सघन वनों में स्थित छाता पहाड़ और अमर गुफा में औराधौरा वृक्ष के नीचे वर्षों तक कठिन निराहार साधना की। कठोर तपस्या के उपरांत उन्हें सत्यपुरुष से आत्मज्ञान प्राप्त हुआ।
"मनखे-मनखे एक समान" का अमर उद्घोष
तपस्या से लौटकर बाबा जी ने घोषणा की कि "सत्य ही ईश्वर है और सत्य ही मानव का सबसे पावन आभूषण है"। उन्होंने तात्कालिक सामंती व वर्णवादी व्यवस्था को चुनौती देते हुए मानव-मानव की पूर्ण समानता ("मनखे-मनखे एक समान") का सिद्धांत दिया।
सतनाम पंथ के सात पावन सिद्धांत
- सतनाम पर विश्वास: केवल एक निराकार सत्यपुरुष में आस्था।
- मूर्तिपूजा का खंडन: पाखंड, जादू-टोना व अंधविश्वास का पूर्ण त्याग।
- जाति-पाति व छुआछूत का निषेध: समस्त मानव जाति का एक समान दर्जा।
- मांसाहार व जीव हिंसा का निषेध: मूक पशु-पक्षियों के प्रति पूर्ण अहिंसा।
- मद्यपान व नशाबंदी: सभी प्रकार के नशीले पदार्थों का पूर्ण त्याग।
- परस्त्री गमन व व्यभिचार का त्याग: पवित्र, सात्विक एवं संयमित गृहस्थ जीवन।
- दोपहर को हल जोतने पर रोक: मूक गोवंश के प्रति करुणा एवं श्रम की मर्यादा।
बाबा गुरु घासीदास जी के १० बहुआयामी दिव्य दृष्टिकोण एवं मानवीय दर्शन
संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी केवल एक संत ही नहीं, अपितु संपूर्ण मानव संस्थान, दार्शनिक, समाजशास्त्री, न्यायविद, अर्थशास्त्री एवं प्रकृति-वैज्ञानिक थे:
- १. दार्शनिक दृष्टिकोण: सभी धर्मग्रंथों, वेदों, उपनिषदों व विचारों का अध्ययन-मनन कर केवल सत्य, कल्याणकारी व सार्वभौमिक तत्वों को स्वीकार करना। जो धारण करने योग्य न हो उसका त्याग करना।
- २. अहिंसा का सर्वोच्च प्रतिमान: केवल जाग्रत अवस्था में ही नहीं, अपितु स्वप्न व विचारों में भी किसी जीव के प्रति हिंसक न होना। मूक पशु-पक्षियों व प्रकृति की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना।
- ३. न्यायिक व क्षमा दृष्टिकोण: बिना गलती के क्षमा मांगना भी कमजोरी है। जो शरणागत होकर अपना अपराध स्वीकार कर भविष्य में न करने का संकल्प ले, उसे सहृदय क्षमा करना; भागते या पराजित पर प्रहार न करना।
- ४. समाजशास्त्रीय समता: "मनखे-मनखे एक समान" के शाश्वत सिद्धांत पर आधारित अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच, जाति-वर्ण के प्रपंच से मुक्त पूर्ण सामाजिक समता।
- ५. चिकित्सा व प्रकृति-विज्ञान: पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश) से निर्मित काया का उपचार प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, आयुर्वेद व तपोबल से करना। मूक पशुओं (गाय, बछड़ा, हाथी, हिरण आदि) को जीवनदान देना।
- ६. अर्थशास्त्रीय विवेक व सादगी: "हीरे का कोई निश्चित मोल नहीं होता, उसे वजन से नहीं बल्कि नीलाम किया जाता है।" फिजूलखर्ची से बचना; धन का सदुपयोग समाज व राष्ट्रहित में करना।
- ७. धर्मशास्त्रीय शुद्धि: बिना परीक्षा व विवेक के किसी भी बात को स्वीकार न करना। पाखंड, स्वर्ग-नरक के भय, अंधविश्वास, मूर्तिपूजा व बलि प्रथा से मुक्त सत्य धर्म का पालन।
- ८. राजनीतिक चेतना व स्वावलंबन: पराधीनता से अच्छा स्वावलंबन है। समाज संगठित होकर शासन-प्रशासन में अपने अधिकारों व मांगों को पूरी मजबूती से रखे।
- ९. आत्मदर्शन व साक्षात्कार: दूसरों के सुख-दुख व भूख-प्यास को अपना समझना। आत्मबोध होने पर कोई शत्रु या मित्र नहीं रहता, समस्त सृष्टि में समभाव दिखता है।
- १०. सर्वसमावेशी सत्संग: साधु, संत, ज्ञानी व विद्वानों की संगति से ज्ञान का बोध होता है। धर्म मनुष्य को जोड़ता है, तोड़ता नहीं।