तपस्वी गुरु अमरदास जी
पावन जीवन गाथा एवं ऐतिहासिक योगदान
बाबा जी द्वारा धर्मनीति (अध्यात्म, आंतरिक चेतना व मानव धर्म) का दायित्व सौंपा गया। चटुवापुरी में 3 दिवसीय अमरत्व समाधि व शिवनाथ तट पर अंतर्ध्यान।
बाल्यकाल एवं अलौकिक वैराग्य
बाबा गुरु घासीदास जी एवं सफूरा माता के ज्येष्ठ सुपुत्र गुरु अमरदास जी का जन्म जुलाई 1794 (गुरु पूर्णिमा) को गिरौदपुरी ग्राम में हुआ। वे बाल्यकाल से ही निर्गुण भक्ति, गहन वैराग्य और सात्विकता के धनी थे।
12 वर्षों का अज्ञातवास एवं अमर गुफा, गुप्त गगन गुफा ( छोटा छाता पहाड़ )
सन् 1798 में तकरीबन 4 वर्ष की आयु में गाथा है की गुरु घासीदास और माता सफुरा पुत्र अमर दास को ले के डोंगरी वन में काम से जा रहे थे गुरु घासीदास सांसारिक जीवन में अपने अवतरण के मूल लक्ष्य को भूल गए थे जिसका बोध कराने हेतु साक्षात सत्पुरुष पिता बाघ (नरसिंह ) रूप लेके आते है और पुत्र अमर दास को अपने साथ ले जाते है जहा से गुरु अमर दास का अज्ञात वास शुरू होता है कहा जाता है की गुरु अमर दास को सत्पुरुष पिता ने 12 वर्ष तक गुप्त गगन गुफा जिसे छोटा छाता पहाड़ कहा जाता है में पूरी की वही दूसरी ओर पुत्र वियोग में माता सफुरा देह त्याग देती है पुत्र और पत्नी को खोने के दुःख से गरू घासीदास जी वनों में तप कने लगते है जिससे उनको अमृत की प्राप्ति होती है और वह माता सफुरा को जीवनदान देते है तथा अज्ञात वास पूरा कर गुरु अमर दास भी वापस लौट आते है।
माता सफूरा द्वारा गोरसदान परीक्षा व वापसी
12 वर्षों के कठोर तप के उपरांत जब 1811 ई. में बाल ब्रह्मचारी गुरु अमरदास जी लौटे, तो माता सफूरा दाई ने सत्य की परख हेतु गोरसदान परीक्षा ली। परीक्षा में सफल होने पर गुरु परिवार व संत समाज में अपार हर्ष छा गया और भण्डारपुरी में विशाल गुरुदर्शन मेला लगा।
माता रुखमणी से विवाह एवं ब्रह्मचर्य व्रत
सन् 1822 में प्रतापपुर की अवतारी कन्या माता रुखमणी (अंगारमती) के साथ उनका पावन विवाह संपन्न हुआ। दोनों ने आजीवन ब्रह्मचर्य धर्म का पालन किया।
धर्मनीति की कमान एवं 21 अनमोल वाणियां
बाबा जी ने दोनों भाइयों में कार्यों का विभाजन करते हुए ज्येष्ठ पुत्र गुरु अमरदास जी को धर्मनीति (अध्यात्म व मानवीय मूल्यों का बोध) की कमान सौंपी। उन्होंने तेलासीपुरी, भण्डारपुरी और चटुवापुरी में जनचेतना जगाई और 21 शाश्वत वाणियां प्रदान कीं।
तपस्वी गुरु अमरदास जी की 21 पावन वाणियां
- अपने सभी कार्यों को समय पर पूर्ण कर लेना चाहिए।
- धीरज ही विपत्ति का सबसे बड़ा सच्चा मित्र है।
- सदैव सतनाम का स्मरण कर सत्य बोलना चाहिए।
- संसार में जन्म है तो मरण भी है, और दुख है तो सुख भी निश्चित है।
- सत्य और अहिंसा ही मानव का श्रेष्ठतम धर्म है।
- गुरु एवं माता-पिता का सदैव सर्वोच्च सम्मान करें।
- समस्त धनों में विद्या रूपी धन ही सर्वोपरि है।
- सदाचार व शिष्टाचार से युक्त मनुष्य ही जीवन में समग्र सफलता पाता है।
- संयम और सात्विक जीवन से मानव की आयु और ऊर्जा बढ़ती है।
- सत्कर्म ही मनुष्य को महान और अमर बनाते हैं।
- काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का त्याग कर सतनाम के मार्ग पर चलें।
- सतनाम का निरंतर जाप करते हुए शाश्वत नैतिक नियमों का पालन करें।
- सत्य का अर्थ है—मन, वचन और कर्म में किसी भी प्रकार के कपट का अभाव।
- सतनाम ही श्रेष्ठ मानव धर्म है; सत्य ही सत्यपुरुष है।
- आत्मविश्वास ही जीवन का सबसे बड़ा संबल और सहायक होता है।
- मानव शरीर नश्वर है, किंतु ज्ञान, दान और सत्कर्म उसे युगों-युगों तक अमर रखते हैं।
- सतत अभ्यास, लगन और निष्ठा से जीवन में निश्चित सफलता मिलती है।
- मूक प्राणियों पर दया और पीड़ितों की निस्वार्थ सेवा करना सच्चा कर्तव्य है।
- साधुता और निर्मलता ही सतनाम संस्कारों की दिव्य मंजूषा है।
- मित्र, शत्रु या किसी पर अनावश्यक आश्रित न रहकर स्वावलंबी बनें।
- परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है; सद्विचारों से आत्मविकास करें।
चटुवापुरी में अमरत्व समाधि एवं अंतर्ध्यान
चटुवा ग्राम में शिवनाथ नदी के तट पर धर्मसभा के दौरान उन्होंने अमरत्व का रहस्य प्रकट करने हेतु जमीन के अंदर 3 दिवसीय अखण्ड ध्यान समाधि लगाई गुरु ने कहा की मैं अमर लोक से अमृत लूँगा और संतो के दुखो को हरूँगा मेरे प्राण अमर लोक जायेंगे पर यह सरीर बेजान यही रहेगा तिन दिनों तक इसकी रखवाली करना बाबा के कहे अनुसार संत जन वहा भजन कर गुरु की प्रतीक्षा करने लगे पर कहा जाता है की दुसरे दिन अंग्रेज सेनिको के द्वारा उनके सरीर को पूरी तरह से दफन कर दिया गया और संतो को खदेड़ दिया गया जिस कारन गुरु वापस नहीं लौट सके । गुरु अमरदास जी ने आकाशवाणी कर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया कि वे प्रत्येक वर्ष पूष पूर्णिमा के पावन मेले पर चटुवापुरी धाम में दर्शन देंगे।| कहा जाता है की गुरु अमरदास ने चेटुवापुरी के जमीदार गौटिया दानी राम महिलांगे को सपने में एके अपने लिए छाव बनाने को कहा जिसके बाद उन्होंने चेटुवापुरी समाधि स्थल का निर्माण किये आज भी उनका परिवार समाधि स्थल की देख रेख विधि विधान में संलग्न है |