युवराज गुरु साहेबदास जी
पावन जीवन गाथा एवं ऐतिहासिक योगदान
1861 में कर्रीमाता से विवाह, बोड़सराधाम के 9 शक्ति केंद्रों का प्रबंधन, 1868 में तेलासीपुरी में गुरु अमरदास समाधि पर गुरुद्वारा निर्माण व कलश रोपण, 1868 में 24 वर्ष की अल्पायु में सतलोक गमन।
जन्म एवं बाल्यकाल
बलिदानी राजागुरु बालकदास जी एवं राधामाता के सुपुत्र गुरु साहेबदास जी का जन्म 1844 ई. में हुआ। अपने बलिदानी पिता के सतलोक गमन के पश्चात मात्र 16 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने चाचा राजागुरु आगरदास जी के मार्गदर्शन में समाज संचालन का दायित्व संभाला।
विवाह एवं बोड़सराधाम गद्दी संचालन
सन् 1861 में 17 वर्ष की आयु में उनका विवाह करणी (कर्रीमाता) के साथ हुआ। राजागुरु आगरदास जी ने उन्हें बोड़सराधाम गद्दी का मुख्य दायित्व सौंपा। उन्होंने बोड़सरा सहित 9 प्रमुख शक्ति केंद्रों का कुशल प्रबंधन किया।
सन् 1868: तेलासीपुरीधाम में गुरुद्वारा निर्माण व पालो रोपण
तेलासीपुरी में तपस्वी गुरु अमरदास जी के समाधि स्थल पर उन्होंने भव्य गुरुद्वारा का निर्माण कराया और 1868 ई. की गुरु पूर्णिमा को विशाल जनसमूह के बीच स्वर्ण कलश व श्वेत पालो फहराया।
अंतिम उपदेश एवं सतलोक गमन
उन्होंने संत समाज को बाबा जी के 7 सुखों (धैर्य, क्षमा, करुणा, दया, मृदुवाणी, अद्वेष और शुचिता) को अपनाने का उपदेश दिया। सन् 1868 में मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में वे सतलोक गमन कर गए।