मंदिर खुला है दर्शन समय: प्रातः 06:00 से रात्रि 10:00 तक
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़
तृतीय पीढ़ी

गुरुगोसाईं अगमदास जी

भारत की संविधान सभा सदस्य, महान स्वतंत्रता सेनानी, सांसद एवं 1935 गिरौदपुरी मेला संस्थापक

तृतीय पीढ़ी

गुरुगोसाईं अगमदास जी

भारत की संविधान सभा सदस्य, महान स्वतंत्रता सेनानी, सांसद एवं 1935 गिरौदपुरी मेला संस्थापक
कालखंड 1895 – 1954 ई.
अवतरण / स्थान 1895 ई., तेलासी ग्राम (छत्तीसगढ़)
संबद्ध तीर्थ धाम गिरौदपुरी धाम (मेला संस्थापक 1935), तेलासीपुरी, भण्डारपुरी, खडुवापुरी
20वीं सदी के महान समाज सुधारक जिन्होंने भारत की संविधान सभा में भाग लेकर वंचितों के अधिकारों को संविधान में सुरक्षित कराया और 1935 में विश्व प्रसिद्ध गिरौदपुरी मेले की नींव रखी।

पावन जीवन गाथा एवं ऐतिहासिक योगदान

जुलाई 1923 में गद्दीनशीन, 108 महंतों की नियुक्ति, 1935 में गिरौदपुरी मेले का ऐतिहासिक शुभारंभ, भारत की संविधान सभा (Constituent Assembly) व प्रथम संसद के सदस्य, वंचित वर्ग के संवैधानिक अधिकारों के प्रणेता।

अवतरण एवं प्रारंभिक जीवन

गुरु अगरमनदास जी एवं कनुकामाता के सुपुत्र गुरुगोसाईं अगमदास जी का जन्म 1895 ई. में ग्राम तेलासी में हुआ। वे प्रखर वक्ता, अद्वितीय संगठनकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी थे।

जुलाई 1923: गद्दी का पदभार एवं 108 महंतों की नियुक्ति

अपने पिता के सतलोक गमन के पश्चात जुलाई 1923 में उन्होंने गद्दी संभाली। उन्होंने पूरे समाज को संगठित करने हेतु 108 योग्य महंतों की नियुक्ति की और "श्वेत ध्वज समाज की शान है" का संकल्प दिलाया।

सन् 1935: ऐतिहासिक गिरौदपुरी धाम मेले का शुभारंभ

गुरुगोसाईं अगमदास जी ने सन् 1935 में गिरौदपुरी धाम में ऐतिहासिक गुरुदर्शन मेले का शुभारंभ किया। उन्होंने बाबा जी की पावन जन्मभूमि और तपोभूमि को राष्ट्रीय व वैश्विक पटल पर स्थापित किया, जो आज विश्व का सबसे बड़ा सतनाम मेला बन चुका है।

भारत की संविधान सभा एवं प्रथम संसद सदस्य

वे भारत की संविधान सभा (Constituent Assembly) के सम्मानीय सदस्य चुने गए। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य राष्ट्र निर्माताओं के साथ मिलकर शोषित, वंचित और पिछड़े वर्गों के मूलभूत अधिकारों को भारतीय संविधान में सुरक्षित कराने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। स्वतंत्रता पश्चात वे प्रथम लोकसभा के सांसद भी रहे।

“कण्ठी, श्वेत ध्वज और सत्य आचरण ही सतनामी की पहचान है। शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों से ही समाज का संपूर्ण उत्थान संभव है।”