प्रतापी गुरु आगरदास जी
पावन जीवन गाथा एवं ऐतिहासिक योगदान
28 अप्रैल 1860 को राजागुरु पदभार ग्रहण, बोड़सरा, भण्डार व तेलासी गद्दी का पुनरुद्धार, 1862 में गिरौदपुरी धाम में स्वर्ण कलश व श्वेत पालो रोपण, घर-घर दुरपत्ता (श्वेत ध्वज) स्थापना फरमान।
अवतरण एवं जीवन परिचय
बाबा गुरु घासीदास जी एवं सफूरा माता के तृतीय सुपुत्र गुरु आगरदास जी का जन्म 1803 ई. (अगहन शुक्ल द्वादशी) को हुआ। सन् 1832 में उनका विवाह रतनपुर निवासी मुटकीमाता जी के साथ हुआ, जिनसे गुरु अगरमनदास जी का अवतरण हुआ।
28 अप्रैल 1860: राजागुरु का पदभार
राजागुरु बालकदास जी की शहादत के पश्चात संत समाज के विशेष आग्रह और सत्य के विधान अनुसार 28 अप्रैल 1860 को संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी ने अपने तृतीय सुपुत्र गुरु आगरदास जी को राजागुरु की गद्दी का कार्यभार सौंपा।
सतनाम शक्ति दरबारों का पुनरुद्धार
गुरु आगरदास जी ने अपने भतीजे गुरु साहेबदास जी को साथ लेकर बोड़सरा, भण्डारपुरी और तेलासीपुरी के शक्ति दरबारों व महलों के निर्माण कार्यों को 1862 में पुनः गति दी।
घर-घर "दुरपत्ता" (श्वेत ध्वज) स्थापना फरमान
18 दिसम्बर 1862 को भण्डारपुरी में उन्होंने ऐतिहासिक फरमान जारी किया कि प्रत्येक सतनामी धर्मावलंबी अपने घर के आंगन में पावन जैतखाम के प्रतिरूप दुरपत्ता (श्वेत ध्वज) स्थापित करें तथा नशापान व जीव हिंसा का पूर्ण परित्याग करें।
सन् 1862: गिरौदपुरी धाम में प्रथम कलश व पालो रोपण
माघ पूर्णिमा 1862 को राजागुरु आगरदास जी ने मुटकीमाता, राधामाता, नीरामाता, प्रतापपुरहीनमाता व गुरु साहेबदास जी के साथ मिलकर गिरौदपुरी धाम के पावन जैतखाम पर सर्वप्रथम श्वेत पालो फहराया और मंदिर पर पंचरत्न कलश स्थापित किया।