मंदिर खुला है दर्शन समय: प्रातः 06:00 से रात्रि 10:00 तक
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़
प्रथम पीढ़ी (द्वितीय सुपुत्र)

बलिदानी राजागुरु बालकदास जी

सतनाम संविधान निर्माता, 1820 ब्रिटिश राजा पदवी, 1857 क्रांति के महानायक व अमर शहीद

प्रथम पीढ़ी (द्वितीय सुपुत्र)

बलिदानी राजागुरु बालकदास जी

सतनाम संविधान निर्माता, 1820 ब्रिटिश राजा पदवी, 1857 क्रांति के महानायक व अमर शहीद
कालखंड 1801 – 1860 ई. (शहादत: 28 मार्च 1860)
अवतरण / स्थान 1801 ई. (भाद्रपद अष्टमी), गिरौदपुरी धाम
संबद्ध तीर्थ धाम भण्डारपुरी धाम, तेलासी बाड़ा, औराबांधा (मुंगेली), बोड़सरा
अद्वितीय संगठनकर्ता, न्यायविद व शूरवीर जिन्होंने समाज को सतनाम संविधान दिया, 1820 में ब्रिटिश शासन से "राजा" की पदवी पाई और 1860 में समाज रक्षा हेतु शहादत दी।

पावन जीवन गाथा एवं ऐतिहासिक योगदान

1820 में राजा की पदवी व स्वर्ण तलवार, भण्डारपुरी धाम व तेलासी बाड़ा का निर्माण, सतनाम संविधान व 5-स्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था (राजमहंत, जिलामहंत, तहसील, भंडारी, छड़ीदार), 1857 स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण।

अवतरण एवं विलक्षण प्रतिभा

बाबा गुरु घासीदास जी एवं सफूरा माता के द्वितीय सुपुत्र गुरु बालकदास जी का जन्म 1801 ई. (भाद्रपद अष्टमी) को हुआ। वे बाल्यकाल से ही अद्भुत संगठन क्षमता, शूरवीरता और न्यायप्रियता के धनी थे।

राजनीति की कमान एवं सतनाम संविधान निर्माण

बाबा जी ने गुरु बालकदास जी को राजनीति (समाज संगठन, न्याय व्यवस्था, सुरक्षा एवं शासन में सहभागिता) का सर्वोच्च दायित्व सौंपा। उन्होंने समाज को संगठित करने के लिए ऐतिहासिक सतनाम संविधान बनाया।

प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू चलाने हेतु उन्होंने 5-स्तरीय संगठन संरचना स्थापित की: राजमहंत, जिलामहंत, तहसील महंत, भंडारी एवं छड़ीदार

सन् 1820: ब्रिटिश शासन द्वारा "राजा" की पदवी

गुरु बालकदास जी की न्यायप्रियता, विशाल जनसमर्थन और सामाजिक सुशासन से प्रभावित होकर सन् 1820 में तत्कालीन ब्रिटिश शासन ने उन्हें "राजा" की उपाधि प्रदान की तथा स्वर्ण तलवार, हाथी, घोड़ा और शस्त्र सेना रखने का अधिकार दिया।

भण्डारपुरी धाम व तेलासी बाड़ा की स्थापना

राजा की पदवी प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने 1820 में भण्डारपुरी धाम एवं तेलासी बाड़ा का भव्य निर्माण प्रारंभ कराया। भण्डारपुरी सतनाम पंथ का प्रमुख प्रशासनिक व सामाजिक केंद्र बन गया।

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

सन् 1857 में जब देश में अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी का बिगुल फूंका गया, तो राजागुरु बालकदास जी ने पूरे मध्य भारत में व्यापक सतनाम राऊटी कर अंग्रेजों के विरुद्ध जनचेतना जगाई और स्वतंत्रता सेनानियों का मनोबल बढ़ाया।

28 मार्च 1860: औराबांधा में अमर शहादत

राजागुरु के बढ़ते प्रभाव और स्वाभिमान से भयभीत होकर सामंती शोषकों ने 28 मार्च 1860 की रात्रि को औराबांधा विश्राम स्थल पर कायरतापूर्ण अचानक हमला कर दिया। राजागुरु बालकदास जी और उनके निष्ठावान अंगरक्षकों (सरहा व जोधाई) ने वीरतापूर्वक मुकाबला करते हुए समाज और सत्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

“सतनाम धर्म की ध्वजा और स्वाभिमान को कभी झुकने नहीं देंगे। सत्य और समाज की रक्षा हेतु प्राणों का बलिदान भी सहर्ष स्वीकार है।”