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तृतीय पीढ़ी (मातृशक्ति)

राजराजेश्वरी करुणामाता जी

गिरौदपुरी धाम मेला संरक्षिका, गुरुमाता एवं वात्सल्य की प्रतिमूर्ति

तृतीय पीढ़ी (मातृशक्ति)

राजराजेश्वरी करुणामाता जी

गिरौदपुरी धाम मेला संरक्षिका, गुरुमाता एवं वात्सल्य की प्रतिमूर्ति
कालखंड 1918 – 2006 ई.
अवतरण / स्थान 1918 ई., केवटा डबरी (छत्तीसगढ़)
संबद्ध तीर्थ धाम गिरौदपुरी धाम, भण्डारपुरी धाम
गिरौदपुरी धाम मेला संरक्षिका, सामूहिक आदर्श विवाह परंपरा की जनक एवं जगतगुरु विजय कुमार जी की पूज्य माता, जिन्होंने 1953 से 2006 तक सतनाम संगठन और तीर्थों का सफल संचालन किया।

पावन जीवन गाथा एवं ऐतिहासिक योगदान

1935 में गुरुगोसाईं अगमदास जी से विवाह, 1951 में जगतगुरु विजय कुमार जी का अवतरण, गिरौदपुरी धाम में सामूहिक आदर्श विवाह परंपरा की जनक, 1953 से 2006 तक गिरौदपुरी मेला व अगमदास आश्रम का संचालन, राजमहंत-दीवान-भंडारी संगठन का विस्तार।

अवतरण एवं जीवन परिचय

राजराजेश्वरी करुणामाता जी का जन्म केवटा डबरी के मालगुजार रतिराम जी के घर हुआ। वे संस्कारी, स्वाभिमानी, बुद्धिमती एवं गृह कार्यों में अत्यंत दक्ष थीं। सन् 1935 में उनका पावन विवाह गुरुगोसाईं अगमदास जी के साथ हुआ।

सतपुरुष बाबा गुरु घासीदास जी की असीम कृपा से गुरुगोसाईं अगमदास जी व राजराजेश्वरी करुणामाता जी की गोद से 19 सितम्बर 1951 को सत्यांश जगतगुरु विजय कुमार जी का इस धरा पर अवतरण हुआ।

सामूहिक आदर्श विवाह की ऐतिहासिक शुरुआत

राजराजेश्वरी करुणामाता जी ने समाज में फिजूलखर्ची और दहेज प्रथा को समूल समाप्त करने हेतु तपोभूमि गिरौदपुरी धाम में 'सामूहिक आदर्श विवाह' की ऐतिहासिक परंपरा प्रारंभ की। उनके मार्गदर्शन में हजारों निर्धन व सामान्य परिवारों के विवाह अत्यंत सादगी और सतनाम रीति से संपन्न हुए, जिससे प्रेरित होकर अन्य समाजों ने भी सामूहिक विवाह अपनाए।

गिरौदपुरी धाम मेला व सामाजिक संगठन संचालन (1953 से 2006)

सन् 1953 में गुरु अगमदास जी के महाप्रयाण के पश्चात करुणामाता जी ने आजीवन सामाजिक संगठन को सुदृढ़ किया। उन्होंने पूरे मध्य भारत में रावटी कर राजमहंत, दीवान, भंडारी व छड़ीदार जैसे पदों पर योग्य पदाधिकारियों का मनोनयन किया।

उन्होंने गिरौदपुरी धाम मेला, खडुवापुरी मेला और प्रतापपुर मेले का सफलतापूर्ण संचालन किया तथा 1953 में नहरपारा रायपुर स्थित गुरु अगमदास आश्रम का संचालन संभाला।

नारी समानता व सम्मान

करुणामाता जी धर्मसभाओं में स्त्री और पुरुष को 'जीवन रूपी रथ के दो समान पहिए' बताकर नारी जाति के स्वाभिमान और अधिकारों के लिए सदैव मुखर रहीं।

31 अगस्त 2006: पंचतत्व में विलीन

31 अगस्त सन् 2006 को राजराजेश्वरी करुणामाता जी पंचतत्व में विलीन हो गईं। उनका सम्पूर्ण जीवन मानव कल्याण, सतनाम धर्म के संरक्षण और समाज में एकता की स्थापना हेतु समर्पित रहा।

“श्रद्धा, सेवा और सद्भाव से ही तीर्थ का गौरव अक्षुण्ण रहता है।”